मुञ्चन्त्यश्रूणि सरव्यस्तु कृष्णोप्यश्रूणि मुञ्चति।
प्रेम्णानद्धास्तथापिष्टा रुपमत्त गजेनहि॥
- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (26)
श्री राधा के अलौकिक सौंदर्य रूपी मतवाले हाथी से कुचले गए, उनके प्रेम में बँधे हुए उनकी अनन्य सखियाँ और स्वयं श्रीकृष्ण सदा नेत्रों से प्रेमाश्रु बहाते रहते हैं।

