पूनम की रजनी सजनी यह, चाँदनी फैल रही सुखदानी। [1]
यमुना तट पै मुरली सुनिकें, वृषभानुलली अति ही सकुचानी॥ [2]
रास कियौ हरि के सँग में, अति चाव भरी नहिं जात बखानी। [3]
औरन की परवाह नहीं, अपनी ठकुराइन राधिकारानी॥ [4]
- ब्रज के सवैया
हे सखी, आज पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि है — चारों ओर फैली चाँदनी मन को अत्यंत सुखद अनुभूति दे रही है। [1]
यमुना तट पर जब श्रीकृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि श्री राधा के कानों में पड़ी, तो वे प्रेम-विह्वल होकर व्याकुल हो उठीं। [2]
उस अति प्रेम की अवस्था में श्रीराधा ने श्रीकृष्ण संग महारास लीला संपन्न की, जिसकी महिमा का वर्णन करने में मेरी वाणी असमर्थ है। [3]
अब मुझे किसी और की कोई परवाह नहीं है, क्योंकि मेरी ठकुरानी तो एकमात्र श्री राधा महारानी हैं। [4]
यमुना तट पर जब श्रीकृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि श्री राधा के कानों में पड़ी, तो वे प्रेम-विह्वल होकर व्याकुल हो उठीं। [2]
उस अति प्रेम की अवस्था में श्रीराधा ने श्रीकृष्ण संग महारास लीला संपन्न की, जिसकी महिमा का वर्णन करने में मेरी वाणी असमर्थ है। [3]
अब मुझे किसी और की कोई परवाह नहीं है, क्योंकि मेरी ठकुरानी तो एकमात्र श्री राधा महारानी हैं। [4]

