कहा करूँ कासों कहूँ को बूझे कित जाउँ  - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (29)

कहा करूँ कासों कहूँ को बूझे कित जाउँ - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (29)

कहा करूँ कासों कहूँ, को बूझे कित जाउँ।
वन वन ही डोलत फिरों, बोलत लेले नाउँ॥

- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (29)

क्या करूँ, किससे कहूँ, कौन समझेगा, किसके पास जाऊँ? श्री प्रिया-प्रियतम के दर्शन की तीव्र लालसा लिए, श्री धाम वृंदावन के वनों में उनका नाम लेलेकर व्याकुलता पूर्वक डोलता हुआ फिर रहा हूँ।