वनराज हमारे प्यारे हैं।
नित्य सदा भू-तल पर राजत, महा प्रेम रस भारे हैं॥ [1]
जो कछु रूचै करैं ये सोई, तन मन अति हितकारे हैं।
श्री कुंजविहारी कौ निजु जीवन, छिन हूँ होत न न्यारे हैं॥ [2]
नित्य सदा भू-तल पर राजत, महा प्रेम रस भारे हैं॥ [1]
जो कछु रूचै करैं ये सोई, तन मन अति हितकारे हैं।
श्री कुंजविहारी कौ निजु जीवन, छिन हूँ होत न न्यारे हैं॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (91)
वनों का राजा, श्रीधाम वृंदावन हमको (रसिकों को) अत्यंत प्यारा है। यह इस भूतल पर नित्य सदा विराजता है एवं दिव्य प्रेम-रस का मूल स्रोत है। [1]
जो भी युगल सरकार और उनके भक्तों को प्रिय होता है, वृंदावन उस भाव का पोषण करता है । यह तन और मन दोनों से अति कल्याणकारी है। श्री ललित किशोरी देव कहते हैं कि श्री कुंजबिहारी के लिए, वृंदावन ही प्राण सर्वस्व है, वे तो एक क्षण के लिए भी इससे विलग नहीं होते। [2]

