श्रीराधावल्लभ की नव-कीरति - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (59)

श्रीराधावल्लभ की नव-कीरति - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (59)

(राग सारंग)
श्रीराधावल्लभ की नव-कीरति वरनत हू न निघात।
भरतखंड की सु कविमंडली वरनत हू न अघात॥ [1]
बड़े रसिक जयदेव वखानी लीला अमृत चुचात ।
(श्री) वृंदावन हरिवंश प्रसंसित, सुनि गोरी मुसकात ॥ [2]
राग सहित हरिदास कही रस नदी बही न थहात।
रसिक अनन्यनि की जूँठनि ‘व्यास’ सखी, रुचि सुचि कै खात ॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (59)

युगल राधावल्लभ का नित्य नवीन यश वाणी से परे है। 
भारत के श्रेष्ठ कविगण भी, जिनके रस का वर्णन करते हुए अघाते नहीं हैं ।  [1]

रसिक जयदेव ने जब इन लीला प्रसंगों का बखान किया तो अमृत (रस) बरसने लगा ।  
श्री हरिवंश जब वृंदावन की महिमा गाते हैं तो गोरी श्री राधा मुस्कुराती हैं ।  [2]

जब स्वामी श्री हरिदास, राग-रति में डूबकर रसगान करते हैं, तो एक अद्भुत रस की अथाह नदी बह उठती है ।
सखी व्यास (श्री हरिराम जी) कहते हैं, ऐसे अनन्य रसिकों के जूठन का वे विभोर होकर सदा पान करते हैं । [3]