नेत नेत कहि निगम पुनि, जाहि सकै नहिं जान।
भयौ मनोहर आइ ब्रज, वही सो हरि हर आन॥
- श्री रसनिधि
जिस ब्रह्म का वेदादि शास्त्र ‘नेति नेति’—‘कहीं आदि-अंत नहीं है’ ऐसा कहकर कुछ भी जानने में असमर्थ हैं, वही पूर्ण परब्रह्म भगवान ब्रज में श्रीकृष्ण के मनोहर रूप में प्रकट हुए हैं।
भयौ मनोहर आइ ब्रज, वही सो हरि हर आन॥
- श्री रसनिधि
जिस ब्रह्म का वेदादि शास्त्र ‘नेति नेति’—‘कहीं आदि-अंत नहीं है’ ऐसा कहकर कुछ भी जानने में असमर्थ हैं, वही पूर्ण परब्रह्म भगवान ब्रज में श्रीकृष्ण के मनोहर रूप में प्रकट हुए हैं।

