प्रिया तेरे चरण कमल की चेरी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी

प्रिया तेरे चरण कमल की चेरी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी

प्रिया तेरे चरण कमल की चेरी।
कुञ्ज द्वार पै ठाडी कब सों, करो नहीं अब देरी॥ [1]
कृपा करो अब झलक दिखावो, ये अभिलाषा मेरी।
सेवा कुञ्ज निकुञ्ज भवन में, नित ही करो तुम फेरी॥ [2]
दया करो अब भूल न जइयो, रखियो अपनी चेरी।
'हित गोपाल' की भोरी स्वामिनि, सुन लो विनती मेरी॥ [3]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी

हे प्रिया जू (श्री राधा)! मैं तुम्हारे चरण कमलों की दासी हूँ। मैं कब से कुञ्ज के द्वार पर आपकी प्रतीक्षा में खड़ी हुई हूँ, कृपा कर ब देर न करो। [1]

कृपा करके एक झलक दिखा दो—यही मेरी अभिलाषा है। आप तो सेवा कुंज रूपी निकुंज वन में सदा वास करती हैं, कृपा कर मुझे अपनी सेवा कर अवसर दें। [2]

अब दया करो, कृपा मुझे भूल मत जाना। मुझे सदा अपनी दासी बनाकर रखना। श्री हित गोपाल दास जी की भोली स्वामिनी, कृपा कर मेरी इस विनती को सुन लीजिए। [3]