(कवित्त)
जोग जग्य जप तप तीरथ गवन व्रत,
कबहुँ न हरिदास श्रवण कथा करी। [1]
भ्रमना भ्रमायौ माया मोह मद लिपटायौ,
वृथां जग बादन में उमर बिता करी॥ [2]
'लाल बलबीर' मति हीन मैं मलीन पीन,
सेवा रसिकन तनहूँ की नहिं जा करी। [3]
कृष्ण अली जू की कृपा दृष्टि बर पाय पाय,
राधा ठकुरायन के पायन की चाकरी॥ [4]
जोग जग्य जप तप तीरथ गवन व्रत,
कबहुँ न हरिदास श्रवण कथा करी। [1]
भ्रमना भ्रमायौ माया मोह मद लिपटायौ,
वृथां जग बादन में उमर बिता करी॥ [2]
'लाल बलबीर' मति हीन मैं मलीन पीन,
सेवा रसिकन तनहूँ की नहिं जा करी। [3]
कृष्ण अली जू की कृपा दृष्टि बर पाय पाय,
राधा ठकुरायन के पायन की चाकरी॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (105)
न मैंने योग-साधना की, न यज्ञ किए, न जप, न तपस्या, और न ही तीर्थों की यात्रा की। यहाँ तक कि मैंने भगवान श्री हरि की कथाएँ भी नहीं सुनीं। [1]
मैं मोह, ममता और अहंकार के जाल में उलझा रहा, और यह अमूल्य जीवन निरर्थक वाद-विवादों में ही व्यर्थ कर दिया। [2]
मैं मूर्ख, मलीन और दुखी था; कभी भी मैंने सच्चे रसिक भक्तों की सेवा नहीं की। [3]
परंतु श्री कृष्ण अली जू (गुरुदेव) की एक कृपा-दृष्टि मात्र से, अब मुझे श्री राधा ठाकुरानी के चरणों की दासी बनने का सौभाग्य मिल गया है। [4]

