निरखि निरखि अलि रूप लुभानी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (59)

निरखि निरखि अलि रूप लुभानी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (59)

निरखि निरखि अलि रूप लुभानी ।
नाहिं तृप्ति पीवत अति आतुर, नयन निमेष भुलानी ॥ [1]
हँसि हँसि सिथिल दुकूल संवारत, हिलगि हियें सरसानी।
अलबेली सु रसिक रसलोभी, रस बतियन बतरानी ॥ [2]

- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (59)

जिस प्रकार भौंरे कमल पर मँडराते हैं, उसी प्रकार सहचरी के नेत्र श्री राधा की अलौकिक रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं। उसका रसपान करते हुए भी वे तृप्त नहीं होते अपितु और भी अधिक लालायित रहते हैं जिसके परिणाम स्वरूप वे पलक झपकना भी भूल जाती हैं। [1]

वे हँस-हँसकर श्री राधा के शिथिल रेशमी वस्त्रों को सँवारती हैं, जिससे उनके हृदय में रस की तरंगें उमड़ने लगती हैं। श्री अलबेली अलि कहती हैं—अलबेली ठकुरानी श्री राधा अपने रस-लोभी प्रियतम रसिक श्यामसुंदर से रस-भरी बातें कर रही हैं। [2]