पंडित या रस तें बचे, ज्यौं बिझुकै मृग रोझ ।
नवै न अचवन पावही, वेद लदैं सिर बोझ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (322)
विशुद्ध अनन्य प्रेम-रस की उपासना से पंडितजन ऐसे दूर भागते हैं, जैसे हरे-भरे खेत में “विझुका” (डरावना उपकरण) को देखकर मृग आदि भाग जाया करते हैं। इसका कारण यह है कि उनके माथे पर विधि-विधान, वेद-शास्त्रों का इतना भारी बोझ लदा रहता है कि वे प्रेम-भक्ति में दीन होकर नहीं उतर पाते। और जब तक कोई दीनातिदीन न बने, तब तक सच्ची प्रेम-भक्ति का आगमन भी अत्यंत कठिन है।
नवै न अचवन पावही, वेद लदैं सिर बोझ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (322)
विशुद्ध अनन्य प्रेम-रस की उपासना से पंडितजन ऐसे दूर भागते हैं, जैसे हरे-भरे खेत में “विझुका” (डरावना उपकरण) को देखकर मृग आदि भाग जाया करते हैं। इसका कारण यह है कि उनके माथे पर विधि-विधान, वेद-शास्त्रों का इतना भारी बोझ लदा रहता है कि वे प्रेम-भक्ति में दीन होकर नहीं उतर पाते। और जब तक कोई दीनातिदीन न बने, तब तक सच्ची प्रेम-भक्ति का आगमन भी अत्यंत कठिन है।

