चल मन वृन्दावन चल रहिये - श्री श्यामदास

चल मन वृन्दावन चल रहिये - श्री श्यामदास

चल मन वृन्दावन चल रहिये।
परम पुनीत सो ब्रज की धरणि, रज धरि शीश जनम-फल लहिये॥ [1]
मञ्जुल सघन पुलिन यमुनातट, सुन्दर पर्ण-कुटी चलि छइये।
सन्त टूक लहि पाय यमुना जल, मिलि रसिकन राधागुण गइये॥ [2]
विहरत आवहिं युगललाल जब, मन की व्यथा कथा सब कहिये।
'श्याम' कृपा ऐसी कब करिहो, चलि वृन्दावन लौट न अइये॥ [3]
- श्री श्यामदास

हे मन, चल वृन्दावन में ही रहें, जहाँ की रज श्री श्यामाश्याम के चरण-रज से मिश्रित परम पुनीत है, जिसे अपने माथे पर लगाकर हम अपने जन्म-जन्मान्तरों के फल को प्राप्त करें। [1]

जहाँ यमुना पुलिन पर सुन्दर सघन वृक्षों से आच्छादित वन है, वहीँ सुन्दर पर्ण-कुटी का निर्माण कर वास करें। संतों की टूक खाकर एवं यमुना जल पानकर रसिकों के संग में श्री राधा के गुणों का गान करें। [2]

जब विचरते हुए युगल किशोर श्री श्यामाश्याम आएंगे तो अपने मन की सारी व्यथा उनसे कहेंगे। हे श्री श्यामाश्याम, कब ऐसी कृपा करोगे कि वृन्दावन में जाकर फिर कभी लौटना न पड़े। [3]