क्षण भंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शीतल अरु मंद, सुगंध समीर चली न चली॥ [1]
कलि काल कुठार लिए फिरता, तन नम्र है चोट झिली न झिली।
ले ले हरिनाम मेरी रसना, फिर अंत समय ये हिली न हिली॥ [2]
- ब्रज के सवैया
कौन जानता है कि इस नश्वर जीवन की कोमल कली कल प्रातः खिलेगी भी या नहीं, और क्या हिमालय की शीतल, मंद तथा सुगंधित वायु का स्पर्श प्राप्त होगा या नहीं। [1]
हे मन! कलियुग अपने हाथ में कुल्हाड़ी लिए चारों ओर विचरण कर रहा है। तेरा यह शरीर अत्यंत कोमल है, वह उसके प्रहारों को सह नहीं सकता। अभी भी समय है — अपनी रसना से नित्य हरिनाम का जप करता रह, क्योंकि कौन जानता है कि अंत समय में यह अवसर तुझे फिर मिले या न मिले। हरिनाम ही तेरा एकमात्र आश्रय है। [2]
हे मन! कलियुग अपने हाथ में कुल्हाड़ी लिए चारों ओर विचरण कर रहा है। तेरा यह शरीर अत्यंत कोमल है, वह उसके प्रहारों को सह नहीं सकता। अभी भी समय है — अपनी रसना से नित्य हरिनाम का जप करता रह, क्योंकि कौन जानता है कि अंत समय में यह अवसर तुझे फिर मिले या न मिले। हरिनाम ही तेरा एकमात्र आश्रय है। [2]

