दुख तजि सुख की चाह नहिं - श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)

दुख तजि सुख की चाह नहिं - श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)

दुख तजि सुख की चाह नहिं, नहिं वैकुण्ठ वेवान।
चरन कमल चित चहत हौं, मोहि तुम्हारी आन॥
- श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)

दयाबाई कहती हैं कि हे भगवान, मैं आपकी सौगंध खाकर कहती हूँ कि भले ही मुझे सदा दुख मिलता रहे, मुझे दुख को छोड़कर सुख की बिल्कुल भी इच्छा नहीं है और न ही मुझे वैकुण्ठ की ही इच्छा है। मैं तो अपने मन को केवल और केवल आपके चरण-कमलों में ही निरंतर लगाना चाहती हूँ।