(राग कान्हरौ)
प्रान दियैं यह प्रेम न पैयै।
ऐसौ महँगौ आहि सखी री, कहि धौं सो कैसैं कैं लैयै ॥ [1]
लाल-लाड़िली कौ यह सर्वसु, तिहिं रस कौं ललचैयै ।
अद्भुत छवि विवि रस की धारा, 'ध्रुव' मन तहाँ न्हवैयै ॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)
हे सखि ! प्राणों का उत्सर्ग करने पर भी लाड़िली-लाल का यह सर्वोपरि प्रेम नहीं मिलता, ऐसा विलक्षण-मूल्यवान् अर्थात् महँगा है यह प्रेम, अतएव हे सखि ! तुम्हीं बताओ इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? [1]
क्योंकि यह तत्सुखमय निष्काम प्रेम वृन्दावन-विलासी श्री लाड़िली-लाल का भी सर्वस्व एवं आराध्य है। सत्य तो यह है कि इस की प्राप्ति का कोई साधन नहीं है, अतएव इसे प्राप्त करने के लिए प्रेमी के मन में इस रस की लोलुपता ही सर्वोपरि उपासना है। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि उपासक को चाहिए कि वह सब ओर से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करके युगल-छवि की अद्भुत रस-धारा में अपने मन को निमज्जन करावे ।[2]
प्रान दियैं यह प्रेम न पैयै।
ऐसौ महँगौ आहि सखी री, कहि धौं सो कैसैं कैं लैयै ॥ [1]
लाल-लाड़िली कौ यह सर्वसु, तिहिं रस कौं ललचैयै ।
अद्भुत छवि विवि रस की धारा, 'ध्रुव' मन तहाँ न्हवैयै ॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)
हे सखि ! प्राणों का उत्सर्ग करने पर भी लाड़िली-लाल का यह सर्वोपरि प्रेम नहीं मिलता, ऐसा विलक्षण-मूल्यवान् अर्थात् महँगा है यह प्रेम, अतएव हे सखि ! तुम्हीं बताओ इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? [1]
क्योंकि यह तत्सुखमय निष्काम प्रेम वृन्दावन-विलासी श्री लाड़िली-लाल का भी सर्वस्व एवं आराध्य है। सत्य तो यह है कि इस की प्राप्ति का कोई साधन नहीं है, अतएव इसे प्राप्त करने के लिए प्रेमी के मन में इस रस की लोलुपता ही सर्वोपरि उपासना है। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि उपासक को चाहिए कि वह सब ओर से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करके युगल-छवि की अद्भुत रस-धारा में अपने मन को निमज्जन करावे ।[2]

