कैं तुव कान परी नहीं, दीनबंधु मम टेर।
चार जुगन सुनि चारि भुज, लगी न एती देर॥
- ब्रज के दोहे
हे दीनबंधो श्री कृष्ण! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी पुकार अभी तक आपके कानों तक पहुँची ही नहीं है, क्योंकि आपने तो पूर्व के चारों युगों में किसी भी पापी के उद्धार में कभी विलंब नहीं किया। उसी प्रकार मेरी पुकार भी सुनकर आप तत्काल उद्धार कर देते। परंतु यह मेरा ही दोष है कि मैंने अब तक स्वयं को वास्तविक दीन नहीं माना, और न ही करुण क्रंदन युक्त, हृदय से आपको कभी पुकारा!
चार जुगन सुनि चारि भुज, लगी न एती देर॥
- ब्रज के दोहे
हे दीनबंधो श्री कृष्ण! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी पुकार अभी तक आपके कानों तक पहुँची ही नहीं है, क्योंकि आपने तो पूर्व के चारों युगों में किसी भी पापी के उद्धार में कभी विलंब नहीं किया। उसी प्रकार मेरी पुकार भी सुनकर आप तत्काल उद्धार कर देते। परंतु यह मेरा ही दोष है कि मैंने अब तक स्वयं को वास्तविक दीन नहीं माना, और न ही करुण क्रंदन युक्त, हृदय से आपको कभी पुकारा!

