श्रीविपिनराज महाराज प्रणतपालन यह नाम तिहारौ है । [1]
जान अजान शरण को जैसे बालक मातु दुलारौ है ॥ [2]
मनवाञ्छित फलदेय सबन को कोटिक सुरतरु वारौ है । [3]
प्रेम प्रवाह रसिकजन प्यारे, तिनकौ प्राण पियारौ है ॥ [4]
अलीमाधुरी के जीवनधन आदि अन्त रखवारौ है ॥ [5]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री वृंदावन जू की विनय पत्रिका (25)
हे वनों के राजा, महाराज श्री वृंदावन धाम! आपको “प्रणतपाल” — शरणागत के रक्षक — के नाम से जाना जाता है। [1]
जैसे एक माँ अपने बालक को स्नेहपूर्वक दुलारती है, चाहे वह बालक कैसा भी हो, वैसे ही आप भी अपने भक्तों को स्नेह करते हैं — चाहे वे आपकी महिमा को जानने वाले हों या अनजान। [2]
आप अपने भक्तों को मनचाहा फल प्रदान करते हैं और करोड़ों कल्पवृक्षों से भी अधिक मूल्यवान हैं। [3]
प्यारे रसिक जनों के लिए आप उनके प्राणों के समान हैं, और उन समस्त प्रेमी रसिकों को रस के प्रवाह में डुबाने वाले मूल स्रोत भी आप ही हैं। [4]
श्री अली माधुरी जी कहते हैं — हे प्यारे वृंदावन धाम! आप ही मेरे सम्पूर्ण जीवन-धन और आदि-अंत के एकमात्र रक्षक हैं। [5]
जान अजान शरण को जैसे बालक मातु दुलारौ है ॥ [2]
मनवाञ्छित फलदेय सबन को कोटिक सुरतरु वारौ है । [3]
प्रेम प्रवाह रसिकजन प्यारे, तिनकौ प्राण पियारौ है ॥ [4]
अलीमाधुरी के जीवनधन आदि अन्त रखवारौ है ॥ [5]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री वृंदावन जू की विनय पत्रिका (25)
हे वनों के राजा, महाराज श्री वृंदावन धाम! आपको “प्रणतपाल” — शरणागत के रक्षक — के नाम से जाना जाता है। [1]
जैसे एक माँ अपने बालक को स्नेहपूर्वक दुलारती है, चाहे वह बालक कैसा भी हो, वैसे ही आप भी अपने भक्तों को स्नेह करते हैं — चाहे वे आपकी महिमा को जानने वाले हों या अनजान। [2]
आप अपने भक्तों को मनचाहा फल प्रदान करते हैं और करोड़ों कल्पवृक्षों से भी अधिक मूल्यवान हैं। [3]
प्यारे रसिक जनों के लिए आप उनके प्राणों के समान हैं, और उन समस्त प्रेमी रसिकों को रस के प्रवाह में डुबाने वाले मूल स्रोत भी आप ही हैं। [4]
श्री अली माधुरी जी कहते हैं — हे प्यारे वृंदावन धाम! आप ही मेरे सम्पूर्ण जीवन-धन और आदि-अंत के एकमात्र रक्षक हैं। [5]

