जुगुललाल तोरी पैयां परतहौं - श्री ललित माधुरी

जुगुललाल तोरी पैयां परतहौं - श्री ललित माधुरी

(राग घाटौं)
जुगुललाल तोरी पैयां परतहौं मो तन नेक निहारो।
श्रीवनवास दान किन दीजै छिनछिन होत खिसारो ॥ [1]
औसर नहिं औसेर करनको कलौ काल विस्तारो।
ललितमाधुरी नित्त लहौं रस चरनकमल पिय प्यारो ॥ [2]

- श्री ललित माधुरी

हे युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण! मैं आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ — कृपा करके एक बार मेरी ओर दृष्टि डालिए। मुझे वृंदावन वास प्रदान कीजिए  क्योंकि वृंदावन से बाहर बिताया हुआ प्रत्येक क्षण जीवन की अपूरणीय क्षति है । [1]

यह निश्चित नहीं कि फिर कभी ऐसा संयोग प्राप्त हो या न हो, अब विलंब करने का कोई अवसर नहीं है, कलियुग का प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है! श्री ललित माधुरी कहते हैं कि हे प्रियतम प्यारी! मैं प्रतिदिन आपके चरणकमलों का रस पान करता रहूँ, यही मेरी प्रार्थना है! [2]