जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (30)

जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (30)

जो मन अरुझ्यो रूप हैं, क्यों हू कहत बनैं न।
रसना कैं तो मन नहीं, मन कैं रसना हैं न ॥

- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (30)

श्यामा-श्याम के अनुपम रूप-सौंदर्य में अटके हुए मन की दशा को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है, क्योंकि जीभ के पास वह मन नहीं है, और मन के पास वह जीभ नहीं है, जो अपनी अवस्था को प्रकट कर सके।