भजन बिन है चोला बेकाम - रूप कुँवरि जी

भजन बिन है चोला बेकाम - रूप कुँवरि जी

(राग पीलू ताल तिताला)
भजन बिन है चोला बेकाम ।
मल अरु मूत्र भरो नर सब तन, है निष्फल यह चाम ॥ [1]
बिन हरि भजन पवित्र न ह्वैहै, धोवौ आठौ याम ।
काया छोड़ हंस उड़ि जैहै, पड़ो रहै धन धाम ॥ [2]
अपनो सुत मुख लू धर देहै, सोच लेहु परिणाम।
‘रूपकुंवरि’ सब छोड़ बसहु ब्रज, भजिये श्यामा श्याम ॥ [3]

- रूप कुँवरि जी 

भगवान के भजन के बिना यह शरीर व्यर्थ है जो मल-मूत्र से भरा है और भक्ति न करने पर यह चाम (चमड़ी का पुतला) भी निष्फल हो जाता है। [1]

भगवान के भजन के बिना शुद्धि नहीं होती, चाहे आठों याम (दिन-रात) इस शरीर को धोते रहो। अंत में हंस रूपी आत्मा शरीर छोड़ कर उड़ जाएगी और धन-संपत्ति सब यहीं पड़ी रह जाएगी। [2]

अपना ही बेटा (अंत समय में) शरीर को आग लगाकर विदा कर देगा, इस परिणाम पर विचार करना चाहिए। ‘रूपकुँवरि’ कहती हैं – जीवन की सार्थकता इसी में है कि सब कुछ छोड़कर ब्रजवास करो और श्री राधा-कृष्ण का निरंतर एवं अनन्य भजन करो। [3]