(कवित्त)
आज कालकल्प जोपै बाराह बरत रह्यो।
जाके ओर छोर आदि ही सों जे परन हैं ॥ [1]
जा ही कारणै जाकौ नाम अखतीज पड्यो।
अक्ष होत तुष्य सवै यासौं करन हैं ॥ [2]
आज दिन झांकी जो निहारे श्रीबिहारीजू की।
आप ही यमराज ताकी लेत ये सरन हैं ॥ [3]
सेवैं हरिदास रूप राशि में 'छबीले' रम्य।
भक्त मन भावते बिहारी के चरन हैं ॥ [4]
- श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी
आज अक्षय तृतीया के पावन दिन पर वह कल्प-काल दिवस प्रकट होता है, जिसका फल नाश नहीं होता — उसका आदि और अंत अनंत से जुड़ा हुआ है। [1]
इसीलिए इसे ‘अखतीज’ कहा गया है — जो भी शुभ कर्म आज किए जाते हैं, वे अक्षय (अविनाशी) बन जाते हैं और शाश्वत फल प्रदान करते हैं। [2]
जो आज श्री बिहारीजी की झाँकी के दर्शन करता है, उसका यमराज भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता (अर्थात मृत्यु का भय मिट जाता है) क्योंकि यमराज स्वयं इन चरणों की शरण में रहता है। [3]
श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी जी कहते हैं कि रूप के सागर, स्वामी हरिदास द्वारा सेवित यह बिहारीजी के चरणकमल, रसिक भक्तों के हृदयों को सदा आनंद से भर देते हैं। [4]
आज कालकल्प जोपै बाराह बरत रह्यो।
जाके ओर छोर आदि ही सों जे परन हैं ॥ [1]
जा ही कारणै जाकौ नाम अखतीज पड्यो।
अक्ष होत तुष्य सवै यासौं करन हैं ॥ [2]
आज दिन झांकी जो निहारे श्रीबिहारीजू की।
आप ही यमराज ताकी लेत ये सरन हैं ॥ [3]
सेवैं हरिदास रूप राशि में 'छबीले' रम्य।
भक्त मन भावते बिहारी के चरन हैं ॥ [4]
- श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी
आज अक्षय तृतीया के पावन दिन पर वह कल्प-काल दिवस प्रकट होता है, जिसका फल नाश नहीं होता — उसका आदि और अंत अनंत से जुड़ा हुआ है। [1]
इसीलिए इसे ‘अखतीज’ कहा गया है — जो भी शुभ कर्म आज किए जाते हैं, वे अक्षय (अविनाशी) बन जाते हैं और शाश्वत फल प्रदान करते हैं। [2]
जो आज श्री बिहारीजी की झाँकी के दर्शन करता है, उसका यमराज भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता (अर्थात मृत्यु का भय मिट जाता है) क्योंकि यमराज स्वयं इन चरणों की शरण में रहता है। [3]
श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी जी कहते हैं कि रूप के सागर, स्वामी हरिदास द्वारा सेवित यह बिहारीजी के चरणकमल, रसिक भक्तों के हृदयों को सदा आनंद से भर देते हैं। [4]

