जिनके देह नेह रस भीने - श्री हित रूप लाल

जिनके देह नेह रस भीने - श्री हित रूप लाल

जिनके देह नेह रस भीने ।
तिनके नयन प्रेम मदमाते, नाते जग के नेकु न चीन्हे ॥ [1]
वेद भेद तजि नेम श्रृंखला, विहँसि भये प्रियतम सौं लीने ।
जै श्री रूपलाल हित गति मति न्यारी, कहि न जात जैसे जल मीने ॥ [2]

- श्री हित रूपलाल जी

जो बड़भागी जन प्रभु के प्रेम-रस में भीग जाते हैं, उनके नेत्र प्रेम के नशे में मतवाले हो जाते हैं । उस प्रेम रस के प्रभाव से वे सांसारिक संबंधों से अनभिज्ञ हो जाते हैं । [1]

वेदों, शास्त्रों और नियमों की समस्त जंजीरों को वे हँसते हुए तोड़ देते हैं और अपने प्रियतम की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन हो जाते हैं। श्री हित रूपलाल जी कहते हैं—ऐसे रसिक प्रेमियों की गति और मति इतनी विलक्षण होती है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। वे अपने प्रियतम में ऐसे मिल जाते हैं, जैसे मछली जल से कभी अलग नहीं हो सकती। [2]