(राग धनाश्री)
छबीली राधे कब दरसन दैहौ।
तुव-मुख-चंद-चकोरी अँखियनि, रूप-सुधा अचवैहौ॥ [1]
यह आसा लागी रहै निस-दिन, कब मन तपत बुझैहौ।
करिकै कृपा कहौ “ब्रजनिधि” को, कब अपनौ करि लैहौ॥ [2]
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (25)
हे छबीली राधे! मुझे कब आप अपने दर्शन से तृप्त करेंगीं? मेरी अँखियाँ चकोरी पक्षी की भाँति आपके चंद्रमुख की सुधा-रस पान करने के लिए व्याकुल हैं। [1]
आपके दर्शन की आशा दिन-रात बनी रहती है — कब मेरे मन की जलन शांत होगी? श्री ब्रजनिधि कहते हैं: “हे ब्रज की निधि राधे! कब आप मुझे अपनाकर मुझ पर कृपा करेंगी? कृपया उत्तर दें।” [2]
छबीली राधे कब दरसन दैहौ।
तुव-मुख-चंद-चकोरी अँखियनि, रूप-सुधा अचवैहौ॥ [1]
यह आसा लागी रहै निस-दिन, कब मन तपत बुझैहौ।
करिकै कृपा कहौ “ब्रजनिधि” को, कब अपनौ करि लैहौ॥ [2]
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (25)
हे छबीली राधे! मुझे कब आप अपने दर्शन से तृप्त करेंगीं? मेरी अँखियाँ चकोरी पक्षी की भाँति आपके चंद्रमुख की सुधा-रस पान करने के लिए व्याकुल हैं। [1]
आपके दर्शन की आशा दिन-रात बनी रहती है — कब मेरे मन की जलन शांत होगी? श्री ब्रजनिधि कहते हैं: “हे ब्रज की निधि राधे! कब आप मुझे अपनाकर मुझ पर कृपा करेंगी? कृपया उत्तर दें।” [2]

