मो निर्धन की ललिता संपति ।
छिन न सकत बिसराय जीय ते, मोहि लटकि लागत पल झँपति ॥ [1]
जाय निरखि प्यारी गद-गद ह्वै, अंक लगनि पुलकित तन कंपति ।
जय श्री वंशी अलि श्री राधा बलि नित प्रति चाहत नित चरनन कों चंपति ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (34)
मेरे जैसे निर्धन की सम्पत्ति श्री ललिता सखी ही हैं। मेरा हृदय एक क्षण के लिए भी उन्हें विस्मृत नहीं कर पाता; वह निरंतर उनसे बँधा रहता है और हर पल उनके संग झूमता है। [1]
जब भी ललिताजी प्यारीजू (श्री राधा) के दर्शन करती हैं, तो वे रोमांचित हो उठती हैं। जब श्री राधा उन्हें आलिंगन करती हैं, तब उनके अंग भावावेश में कंपित और पुलकित हो जाते हैं। श्री वंशी अली कहते हैं—“ललिता जी नित्य प्रति श्री राधा पर स्वयं को न्योछावर करती हैं और सदा उनके चरणों की सेवा करने की सर्वोकृष्ट अभिलाषा रखती हैं।” [2]
छिन न सकत बिसराय जीय ते, मोहि लटकि लागत पल झँपति ॥ [1]
जाय निरखि प्यारी गद-गद ह्वै, अंक लगनि पुलकित तन कंपति ।
जय श्री वंशी अलि श्री राधा बलि नित प्रति चाहत नित चरनन कों चंपति ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (34)
मेरे जैसे निर्धन की सम्पत्ति श्री ललिता सखी ही हैं। मेरा हृदय एक क्षण के लिए भी उन्हें विस्मृत नहीं कर पाता; वह निरंतर उनसे बँधा रहता है और हर पल उनके संग झूमता है। [1]
जब भी ललिताजी प्यारीजू (श्री राधा) के दर्शन करती हैं, तो वे रोमांचित हो उठती हैं। जब श्री राधा उन्हें आलिंगन करती हैं, तब उनके अंग भावावेश में कंपित और पुलकित हो जाते हैं। श्री वंशी अली कहते हैं—“ललिता जी नित्य प्रति श्री राधा पर स्वयं को न्योछावर करती हैं और सदा उनके चरणों की सेवा करने की सर्वोकृष्ट अभिलाषा रखती हैं।” [2]

