प्रीतम मेरा एक तू, ‘सुंदर’ और न कोइ।
गुप्त भया किस कारज, काहि न परगट होइ॥
- श्री सुंदर जी
हे मेरे परम प्रिय प्रभु! आप ही एकमात्र मेरे प्रियतम हैं। आप किस कारण मुझसे छिपे हुए हैं? अब स्वयं को प्रकट कर मुझे दर्शन क्यों नहीं देते!
गुप्त भया किस कारज, काहि न परगट होइ॥
- श्री सुंदर जी
हे मेरे परम प्रिय प्रभु! आप ही एकमात्र मेरे प्रियतम हैं। आप किस कारण मुझसे छिपे हुए हैं? अब स्वयं को प्रकट कर मुझे दर्शन क्यों नहीं देते!

