एक अखंडित एकरस निरवधि रति जो होइ - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (4)

एक अखंडित एकरस निरवधि रति जो होइ - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (4)

एक अखंडित एकरस, निरवधि रति जो होइ।
मिलत मिलत विरह न घटै, प्रेम कहते हैं सोइ॥   

- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (4)

जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।