रहैं अंग संग अनंग हरैं मनु -  श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सेवैया (30)

रहैं अंग संग अनंग हरैं मनु - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सेवैया (30)

(सवैया)
रहैं अंग संग अनंग हरैं मनु, नीरद नील दामिनी दमकैं ।  [1]
बरनी न परै छवि कौ कवि तै, सत सेस महेस की बुद्धि समकैं॥ [2]
श्रीबिहारी-बिहारिनिदासि निकुंजन, निरखत ही सुख प्रेम रमकैं । [3]
चितै वर राज बिहारिनि नित्त, अद्भुत जोति चिबुक चमकैं ॥ [4]

- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सेवैया (30)

श्री कुंज बिहारी एवं कुंज बिहारिणी सदा एक संग रहते हैं। उनका सौंदर्य स्वयं कामदेव के मन को भी मोहित कर लेता है। श्रीकृष्ण का रूप नव-वर्षा के मेघ के समान है, और श्रीराधा बिजली की चमक जैसी दैदीप्यमान हैं। [1]

किसी भी कवि या मुनि में ऐसी सामर्थ्य नहीं है, यहाँ तक कि शेषनाग अपने सौ मुखों से या स्वयं शिवजी भी उनके अनुपम सौंदर्य का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। [2]

श्री बिहारीन दास, जो बिहारी-बिहारिनी की अनन्य दासी हैं, नित्य नवीन निकुंजों में उनकी प्रेम-लीलाओं का दर्शन करते हुए दिव्य प्रेम-आनंद में मग्न रहती हैं। [3]

वे कहती हैं कि मेरे हृदय पर सदा विहारिनी रानी (श्री राधा) ही राज करती हैं, जिनकी ज्योति अनुपम है। [4]