(श्री) राधा कौ वृन्दावन रसमय, मोहन को प्यारौ लगै अति है । [1]
पैंड़ एक करि तजत न सींवा, प्रीतम की ऐसी भई गति है ॥ [2]
यातें गह्यौ अनन्यनि दृढ़ करि, मन क्रम बच बढ़ी निर्मल रति है। [3]
‘वृन्दावन’ हित रूप धाम यह जहाँ बढ़ति दम्पति सम्पति है ॥ [4]
- चाचा हित वृंदावन दास
श्री राधा का वृंदावन अति रसमय है, जो मोहन (श्रीकृष्ण) को अत्यंत प्रिय है। [1]
प्रीतम श्रीकृष्ण की वृंदावन के प्रति ऐसी अनन्य निष्ठा है कि वे एक पग भी वृंदावन की सीमा के बाहर नहीं रखते। [2]
इसी कारण रसिकों ने भी मन, कर्म और वचन से वृंदावन के प्रति अनन्य निष्ठा धारण की है, जिससे विशुद्ध प्रेम में उनकी रति प्रतिदिन बढ़ती रहती है। [3]
चाचा वृंदावन दास कहते हैं—यह वृंदावन साक्षात प्रेम का धाम है, जहाँ केवल वास मात्र करने से, बिना किसी अपराध के, दंपति (श्री राधा-कृष्ण) की प्रेम-सम्पदा निरंतर वर्धमान होती रहती है। [4]
पैंड़ एक करि तजत न सींवा, प्रीतम की ऐसी भई गति है ॥ [2]
यातें गह्यौ अनन्यनि दृढ़ करि, मन क्रम बच बढ़ी निर्मल रति है। [3]
‘वृन्दावन’ हित रूप धाम यह जहाँ बढ़ति दम्पति सम्पति है ॥ [4]
- चाचा हित वृंदावन दास
श्री राधा का वृंदावन अति रसमय है, जो मोहन (श्रीकृष्ण) को अत्यंत प्रिय है। [1]
प्रीतम श्रीकृष्ण की वृंदावन के प्रति ऐसी अनन्य निष्ठा है कि वे एक पग भी वृंदावन की सीमा के बाहर नहीं रखते। [2]
इसी कारण रसिकों ने भी मन, कर्म और वचन से वृंदावन के प्रति अनन्य निष्ठा धारण की है, जिससे विशुद्ध प्रेम में उनकी रति प्रतिदिन बढ़ती रहती है। [3]
चाचा वृंदावन दास कहते हैं—यह वृंदावन साक्षात प्रेम का धाम है, जहाँ केवल वास मात्र करने से, बिना किसी अपराध के, दंपति (श्री राधा-कृष्ण) की प्रेम-सम्पदा निरंतर वर्धमान होती रहती है। [4]

