ब्रजबन लीला माधुरी निरविधि रस कौ सार - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, अनुभव चंद्रिका (54)

ब्रजबन लीला माधुरी निरविधि रस कौ सार - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, अनुभव चंद्रिका (54)

ब्रजबन-लीला-माधुरी, निरविधि रस कौ सार ।
रसिक-मुकुटमणि कृपा तें, पायौ प्रेम-आधार ॥

- श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, अनुभव चंद्रिका (54)

ब्रजवन की लीलाओं की मधुरता अनंत रस का सार है। रसिक शिरोमणि श्री राधा-कृष्ण की कृपा से मुझे प्रेम का आधार प्राप्त हुआ है।