भ्रमत रहत निसिदिन छिना - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (93)

भ्रमत रहत निसिदिन छिना - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (93)

(दोहा)
भ्रमत रहत निसिदिन छिना, छके अधिक रस नेह।
प्यारी तुव पद कंज पर, मो दृग मधुकर एह ॥


(पद)
प्यारी लाड़िली पदारविन्द नैन मधुकर मेरे ।
भ्रमत रहत निसिदिना छकि छिनछिना अधिकेरे ॥ [1]
कोटि जतन करहु कोउ फिरत नाहि फेरे ।
श्रीहरिप्रिया सहज सुभाव गहि रहे अनेरे ॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (93)

(दोहा)
श्री कृष्ण कहते हैं कि हे राधे! मेरे नेत्र-रूपी भौंरे तुम्हारे कमल-रूपी चरणों के प्रेम-रस में ऐसे सराबोर रहते हैं कि ये भौंरे उन चरण-कमलों पर रात-दिन मंडराते रहते हैं।

(पद)
हे प्यारी लाड़िलीजू ! मेरे नयन रूपी भौंरा यद्यपि आपके स्नेह रस में सदा छके रहते हैं तो भी आपके चरण कमलों पर रात दिन मँडराते ही रहते हैं। इन भौरों की भ्रमणता क्षण क्षण में बढ़ती रहती है। [1]

चाहे कोई कोटि यत्न करे ये रोकने से भी नहीं रुकते हैं। हे श्रीहरिप्रिया सखी! और तो निकट से पकड़ते हैं इन मेरे दृग रूपी मधुकरों ने श्रीप्यारी जू के चरण रूपी कमलों को दूर से ही पकड़ रखा है। [2]