हौं रूसोंगी कुँवरि सौं, कुँवरि मनावै मोहि ।
कुँवरि जो मो सौं रुसि है, हौं पाइनि परों निहोहि ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (39)
मैं कुँवरि (श्री राधा) से प्रेमपूर्वक रूठ जाऊँ, तो श्री राधा ही मुझे मनाएँगी। परंतु यदि कभी श्री राधा मुझसे रूठ जाएँ, तो मैं उनके चरणों में गिरकर उन्हें मनाने के लिए हर संभव उपाय करूँगी, जिससे वे प्रसन्न हो जाएँ।
कुँवरि जो मो सौं रुसि है, हौं पाइनि परों निहोहि ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (39)
मैं कुँवरि (श्री राधा) से प्रेमपूर्वक रूठ जाऊँ, तो श्री राधा ही मुझे मनाएँगी। परंतु यदि कभी श्री राधा मुझसे रूठ जाएँ, तो मैं उनके चरणों में गिरकर उन्हें मनाने के लिए हर संभव उपाय करूँगी, जिससे वे प्रसन्न हो जाएँ।

