(राग पूरबी)
ए दोउ राजत रंग भरे री।
भुज जोरें सांवल तन गोरें, गहि द्रुम डारि खरे री ॥ [1]
पुलकत अंग अनंग छके छवि, बातन रंग ढेरे री।
पान भरे मुख सुख सरसाने, अरुझाने दृग पल विसरे री ॥ [2]
नवल छैल चितवत प्रीतम तन, हँसि हँसि प्रान हरे री ।
अलबेली अलि रूप तरंगनि, नैना मीन परे री ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (166)
युगल जोड़ी, गौर-वर्ण श्री राधा एवं श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण प्रेम के दिव्य रंगों में सराबोर होकर, एक-दूसरे का आलिंगन कर, एक वृक्ष की डाल को थामे खड़े हैं। [1]
उनके अंग अनंग की छवि से छके हुए, प्रेम से रोमांचित हो रहे हैं । वे दोनों प्रेम भरी बातें कर मदहोश हो रहे हैं । पान की लालिमा से रचित उनके मुख अत्यंत मधुर लग रहे हैं, और उनकी आँखें एक-दूसरे में इतनी उलझी हुई हैं कि वे पलक झपकना भी भूल गए हैं। [2]
नित्य किशोरी श्री राधा, प्रीतम की ओर मुस्कुरा कर निहारती हैं और उनके प्राणों का ही हरण कर लेती हैं । श्री अलबेली अलि जी, युगल के सौंदर्य रूपी लहरों में झूम रही हैं, उनके नेत्र युगल की छवि में में मीनवत अटके हुए हैं । [3]
ए दोउ राजत रंग भरे री।
भुज जोरें सांवल तन गोरें, गहि द्रुम डारि खरे री ॥ [1]
पुलकत अंग अनंग छके छवि, बातन रंग ढेरे री।
पान भरे मुख सुख सरसाने, अरुझाने दृग पल विसरे री ॥ [2]
नवल छैल चितवत प्रीतम तन, हँसि हँसि प्रान हरे री ।
अलबेली अलि रूप तरंगनि, नैना मीन परे री ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (166)
युगल जोड़ी, गौर-वर्ण श्री राधा एवं श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण प्रेम के दिव्य रंगों में सराबोर होकर, एक-दूसरे का आलिंगन कर, एक वृक्ष की डाल को थामे खड़े हैं। [1]
उनके अंग अनंग की छवि से छके हुए, प्रेम से रोमांचित हो रहे हैं । वे दोनों प्रेम भरी बातें कर मदहोश हो रहे हैं । पान की लालिमा से रचित उनके मुख अत्यंत मधुर लग रहे हैं, और उनकी आँखें एक-दूसरे में इतनी उलझी हुई हैं कि वे पलक झपकना भी भूल गए हैं। [2]
नित्य किशोरी श्री राधा, प्रीतम की ओर मुस्कुरा कर निहारती हैं और उनके प्राणों का ही हरण कर लेती हैं । श्री अलबेली अलि जी, युगल के सौंदर्य रूपी लहरों में झूम रही हैं, उनके नेत्र युगल की छवि में में मीनवत अटके हुए हैं । [3]

