तन वृन्दावन वास कर धन वृन्दावन वास - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (84)

तन वृन्दावन वास कर धन वृन्दावन वास - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (84)

तन वृन्दावन वास कर, धन वृन्दावन वास ।
मन वृन्दावन लीन कर, वृन्दावन रसरास ॥

- श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (84)

अपने तन से वृंदावन में वास करना चाहिए, क्योंकि वृंदावन वास जीवन का अमूल्य धन है। मन को भी वृंदावन में लीन कर, प्रिया-प्रियतम की वृंदावन से संबंधित रस लीलाओं का निरंतर चिंतन करना चाहिए।