(राग-विहाग)
सदा सखि सुन व्रज ही में रहनो ।
मन की व्यथा कुंजकुंजन में, लता पता प्रति कहनों ॥ [1]
ओरन सों कहा काज हमें अब, आन परे सो सहनों ।
युगल किशोर केलि रस संगम, स्मरण करत मन दहनो ॥ [2]
रसिकन संग हिलमिल प्रिय सजनी, कछुक गूढ रस गहनों ।
'द्वारकेश' अन्तर रस संगम, उभय उदधि में बहनों ॥ [3]
- श्री द्वारकेश जी
हे सखी! सुनो हम केवल ब्रज में ही सदा वास करेंगें । वहाँ अपने हृदय की पीड़ा को कुंजों के हर पत्ते एवं हर लता से कहेंगें। [1]
अब मुझे और किसी से कोई प्रयोजन नहीं—जो भी आए, मैं चुपचाप सह लूँगी। जब-जब मैं उस युगल किशोर की रसमयी लीलाओं का स्मरण करती हूँ, मेरा हृदय विरह की वेदना से तड़प उठता है। [2]
रसिक जनों की संगति में मैं वहाँ कुछ अति गुह्य रस को अनुभव कर सकूँगी। श्री द्वारकेश कहते हैं—आओ, हम दोनों युगल स्वरूप के आंतरिक रस-मिलन की रस-सरिता में बह चलें। [3]
सदा सखि सुन व्रज ही में रहनो ।
मन की व्यथा कुंजकुंजन में, लता पता प्रति कहनों ॥ [1]
ओरन सों कहा काज हमें अब, आन परे सो सहनों ।
युगल किशोर केलि रस संगम, स्मरण करत मन दहनो ॥ [2]
रसिकन संग हिलमिल प्रिय सजनी, कछुक गूढ रस गहनों ।
'द्वारकेश' अन्तर रस संगम, उभय उदधि में बहनों ॥ [3]
- श्री द्वारकेश जी
हे सखी! सुनो हम केवल ब्रज में ही सदा वास करेंगें । वहाँ अपने हृदय की पीड़ा को कुंजों के हर पत्ते एवं हर लता से कहेंगें। [1]
अब मुझे और किसी से कोई प्रयोजन नहीं—जो भी आए, मैं चुपचाप सह लूँगी। जब-जब मैं उस युगल किशोर की रसमयी लीलाओं का स्मरण करती हूँ, मेरा हृदय विरह की वेदना से तड़प उठता है। [2]
रसिक जनों की संगति में मैं वहाँ कुछ अति गुह्य रस को अनुभव कर सकूँगी। श्री द्वारकेश कहते हैं—आओ, हम दोनों युगल स्वरूप के आंतरिक रस-मिलन की रस-सरिता में बह चलें। [3]

