अब रहिहौं ब्रजभूमि की, ह्वै पगमारग धूरि।
विचरत पद मोपै परै, सब सुख जीवन मूरि॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (66.2)
ब्रह्मज्ञानी उद्धव कहते हैं—“हे प्रभु! अब मैं सदा के लिए ब्रज में ही ब्रज की रज बनकर वास करना चाहता हूँ, ताकि जब यह प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ विचरण करें, तो उनके चरणों की धूल मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ। यही मेरे जीवन का परम आधार है।”
विचरत पद मोपै परै, सब सुख जीवन मूरि॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (66.2)
ब्रह्मज्ञानी उद्धव कहते हैं—“हे प्रभु! अब मैं सदा के लिए ब्रज में ही ब्रज की रज बनकर वास करना चाहता हूँ, ताकि जब यह प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ विचरण करें, तो उनके चरणों की धूल मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ। यही मेरे जीवन का परम आधार है।”

