कोउक अंग बिभूति लगावत - श्री सुंदर जी

कोउक अंग बिभूति लगावत - श्री सुंदर जी

(सवैया)
कोउक अंग बिभूति लगावत, कोउक होत निराट दिगम्बर । [1]
कोउक स्वेत कषाइक औढत, कोउक काथ रंगै बहु अम्बर ॥ [2]
कोउक बल्कल शीश जटा नख, कोउक औढत हैं जु बघम्बर । [3]
सुन्दर एक अज्ञान गये बिनु, ये सब दीसत आहि अडम्बर ॥ [4]

- श्री सुंदरदास जी

कोई शरीर पर भस्म लगाता है, कोई पूर्णत: नग्न होकर दिगंबर बन जाता है। [1]

कोई सफेद वस्त्र धारण करता है, कोई वृक्षों की छाल से रंगे विविध वस्त्र पहनता है। [2]

कोई सिर पर जटाएँ रखता है, शरीर पर वल्कल धारण करता है, और बड़े-बड़े नाखून रख लेता है; कोई बाघम्बर पहनकर स्वयं को विरक्त दिखाता है। [3]

सुंदरदास जी कहते हैं कि यदि परमात्मा का सच्चा ज्ञान नहीं है, और हृदय में प्रभु की भक्ति नहीं है, तो ये सभी बाह्य साधन केवल ढोंग और दिखावा ही प्रतीत होते हैं। [4]