सर्पदष्टाः पशुहताः पावकांबुविनाशिताः ।
लब्धाऽपमृत्यवो ये च माथुरे मम लोकगाः ॥
- स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (50)
जो भी ब्रज में मृत्यु को प्राप्त करते हैं, भले ही साँप के काटने से, जंगली पशुओं द्वारा, अग्नि में जलकर, जल में डूबने से अथवा किसी भी प्रकार की अकाल मृत्यु से, वे सभी मेरे दिव्य धाम को प्राप्त होते हैं।
लब्धाऽपमृत्यवो ये च माथुरे मम लोकगाः ॥
- स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (50)
जो भी ब्रज में मृत्यु को प्राप्त करते हैं, भले ही साँप के काटने से, जंगली पशुओं द्वारा, अग्नि में जलकर, जल में डूबने से अथवा किसी भी प्रकार की अकाल मृत्यु से, वे सभी मेरे दिव्य धाम को प्राप्त होते हैं।

