(राग गौरी)
श्री हरिवंश सरन जे आये ।
श्री वृषभानुकुमरि नंदनंदन, निजकर अपनी चिट्ठी चढ़ाये ॥ [1]
दिये मुकराय कछू नहि गोयौ, किये मनोरथ मन के भाये ।
श्रीव्यास सुवन चरनन रज परसत, ‘नागरीदास’ से रंक जिवाये ॥ [2]
- श्री नेह नागरी दास, श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, सिद्धांत (136)
जो भी जीव श्रीहरिवंश महाप्रभु जी की शरण में आ गए, उनका नाम स्वयं श्री राधा-श्यामसुन्दर ने अपने हस्तकमल से भक्तों की सूची में अंकित कर लिया। [1]
उन्होंने दर्पणवत् अपना समस्त रहस्य प्रकट कर दिए, कुछ भी छिपाया नहीं। जीव के मन के सभी मनोरथ पूर्ण कर दिए।
श्री नागरीदास जी कहते हैं: “उन्होंने मुझ जैसे रंक, पामर प्राणी को भी जीवनदान दिया है। मैं व्याससुत श्रीहरिवंश महाप्रभु जी की चरण-रज का स्पर्श करता हूँ और श्रद्धा से उसे अपने मस्तक पर धारण करता हूँ।” [2]
श्री हरिवंश सरन जे आये ।
श्री वृषभानुकुमरि नंदनंदन, निजकर अपनी चिट्ठी चढ़ाये ॥ [1]
दिये मुकराय कछू नहि गोयौ, किये मनोरथ मन के भाये ।
श्रीव्यास सुवन चरनन रज परसत, ‘नागरीदास’ से रंक जिवाये ॥ [2]
- श्री नेह नागरी दास, श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, सिद्धांत (136)
जो भी जीव श्रीहरिवंश महाप्रभु जी की शरण में आ गए, उनका नाम स्वयं श्री राधा-श्यामसुन्दर ने अपने हस्तकमल से भक्तों की सूची में अंकित कर लिया। [1]
उन्होंने दर्पणवत् अपना समस्त रहस्य प्रकट कर दिए, कुछ भी छिपाया नहीं। जीव के मन के सभी मनोरथ पूर्ण कर दिए।
श्री नागरीदास जी कहते हैं: “उन्होंने मुझ जैसे रंक, पामर प्राणी को भी जीवनदान दिया है। मैं व्याससुत श्रीहरिवंश महाप्रभु जी की चरण-रज का स्पर्श करता हूँ और श्रद्धा से उसे अपने मस्तक पर धारण करता हूँ।” [2]

