श्री बिहारीदास मन सौं कहै, अब न लगाऊँ तोहि ।
जस गाऊँ हरिदास कौ, तैं सुख दीनों मोहि॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (265)
श्री बिहारिन देव अपने मन से उपदेश करते हैं — “अब तू सब ओर से भलीभांति स्वयं को हटा कर, केवल स्वामी श्री हरिदास जी के रस-यश में, अर्थात् युगल सरकार के अखंड नित्य विहार रस में ही अपने आप को सदा-सर्वदा स्थिर कर दे क्योंकि जो रस यहाँ प्राप्त होता है वैसा और कहीं नहीं है ।”
जस गाऊँ हरिदास कौ, तैं सुख दीनों मोहि॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (265)
श्री बिहारिन देव अपने मन से उपदेश करते हैं — “अब तू सब ओर से भलीभांति स्वयं को हटा कर, केवल स्वामी श्री हरिदास जी के रस-यश में, अर्थात् युगल सरकार के अखंड नित्य विहार रस में ही अपने आप को सदा-सर्वदा स्थिर कर दे क्योंकि जो रस यहाँ प्राप्त होता है वैसा और कहीं नहीं है ।”

