देह धरे को अब फल पायो - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (121)

देह धरे को अब फल पायो - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (121)

देह धरे को अब फल पायो ।
बीते बहुत दिवस असमंजस, माया नाच नचायो ॥ [1]
थोहरबन तैं मोहि काढ़ि थिर, वृन्दाविपुन बसायो ।
कौन कृपा अनयास भई हौं, निज मन हेरि हिरायो ॥ [2]
निसदिन पहर घरी छिन छिन पल, नित आनन्द रहै सरसायो ।
नागरिदास दास ह्वै कै जो, यहाँ न आयो सो पछितायो ॥ [3]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (121)

अब मैंने इस मानव देह धारण करने का असली फल पाया है। बहुत समय तक इस सांसारिक जाल के उलझनों में फँसा रहा और माया मुझे नाच नचाती रही । [1]

भगवान की कृपा ने मुझे उस निष्फल संसार से निकालकर, अपने निज धाम, श्री वृन्दावन में वास प्रदान कर दिया । यह कैसी अद्भुत, अनायास कृपा हुई! मैं अपने हृदय में देखता हूँ और चकित रह जाता हूँ। [2]

यहाँ दिन-रात, हर क्षण, हर पल, आनंद की रस-धारा निरंतर बहती रहती है। श्री नागरीदास कहते हैं: “जो कोई भगवान का दास है, परंतु फिर भी यदि वह वृंदावन नहीं आया, तो वह आने वाले समय में अवश्य ही पछताएगा।” [3]