श्रीवृषभान से राने जहाँ - श्री किशोरी अलि

श्रीवृषभान से राने जहाँ - श्री किशोरी अलि

(सवैया)
श्रीवृषभान से राने जहाँ, रानी कीरति की जहाँ कीरति छाजै। [1]
मोहन हु बिकसाने रहैं, जु सिहाने ‘किशोरी अलि’ बने राजैं ॥ [2]
हीय सदा हरषाने रहैं, सरसाने रहैं पग सेवन काजैं। [3]
को बरसाने की रीस करै, जाके सीस पै राधिका रानी विराजैं ॥ [4]

- श्री किशोरी अलि

वह स्थान जहाँ श्री वृषभानु राजा हैं और रानी कीर्ति का यश चारों ओर फैला हुआ है। [1]

जहाँ स्वयं मोहन (श्रीकृष्ण) प्रफुल्लित रहते हैं, क्योंकि वहाँ किशोरी जी सिंहासन पर रानी बनकर विराजमान रहती हैं। श्रीकृष्ण स्वयं उनके अधीन रहते हैं। [2]

जहाँ उनका हृदय सदा आनंदित रहता है, क्योंकि वे श्री राधारानी के चरणों की सेवा-रस में लीन रहते हैं। [3]

जिसके सिर पर स्वयं राधारानी विराजमान हों, ऐसे बरसाना धाम की बराबरी कौन कर सकता है? [4]