पंकज विषधर मीन मृग, सर खंजन बादाम ।
प्यारी तेरे दृगन के, यह बिन दाम गुलाम ॥
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (94)
हे प्यारी जू (श्री राधा)! कमल, सर्प, मछली, मृग, बाण, खंजन पक्षी और बादाम — ये सब तुम्हारी आँखों के बिना मूल्य के गुलाम हैं, क्योंकि तुम्हारे नेत्रों की अनुपम छवि ने इनकी शोभा को अर्थहीन कर दिया है।
प्यारी तेरे दृगन के, यह बिन दाम गुलाम ॥
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (94)
हे प्यारी जू (श्री राधा)! कमल, सर्प, मछली, मृग, बाण, खंजन पक्षी और बादाम — ये सब तुम्हारी आँखों के बिना मूल्य के गुलाम हैं, क्योंकि तुम्हारे नेत्रों की अनुपम छवि ने इनकी शोभा को अर्थहीन कर दिया है।

