हरि जी बाँह गहो अब मेरी, भव सागर सों काढ़ो।
या जग में कोउ हितू न मेरा, फंद परयौ है गाढ़ो॥ [1]
पाँचो चोर बसे घट भीतर, ममता डारी फाँसी।
'गुरुछौना' को अपना करकै, राखो चरणन पासी ॥ [2]
- श्री गुरु छौनाजी महाराज, विनय की मांझ
हे हरि जी! कृपा करके अब मेरी बाँह पकड़िए और मुझे इस संसार रूपी दुख सागर से बाहर निकालिए। इस संसार में मेरा कोई सच्चा हितैषी नहीं है, मैं तो मोह-माया के विशाल जाल में फँस गया हूँ। [1]
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार — ये पाँच चोर मेरे हृदय में घर कर चुके हैं, और मोह ने मेरे गले में फाँसी का फंदा डाल दिया है। हे कृपालु श्रीकृष्ण!!अब मुझे आप अपना स्वीकार कर, अपने चरणों के समीप, श्री धाम वृंदावन में वास दीजिए । [2]
या जग में कोउ हितू न मेरा, फंद परयौ है गाढ़ो॥ [1]
पाँचो चोर बसे घट भीतर, ममता डारी फाँसी।
'गुरुछौना' को अपना करकै, राखो चरणन पासी ॥ [2]
- श्री गुरु छौनाजी महाराज, विनय की मांझ
हे हरि जी! कृपा करके अब मेरी बाँह पकड़िए और मुझे इस संसार रूपी दुख सागर से बाहर निकालिए। इस संसार में मेरा कोई सच्चा हितैषी नहीं है, मैं तो मोह-माया के विशाल जाल में फँस गया हूँ। [1]
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार — ये पाँच चोर मेरे हृदय में घर कर चुके हैं, और मोह ने मेरे गले में फाँसी का फंदा डाल दिया है। हे कृपालु श्रीकृष्ण!!अब मुझे आप अपना स्वीकार कर, अपने चरणों के समीप, श्री धाम वृंदावन में वास दीजिए । [2]

