मोसों नाहिं कछुक बनिआई - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (73)

मोसों नाहिं कछुक बनिआई - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (73)

(राग मालकौस)
मोसों नाहिं कछुक बनिआई।
हों सदैव औगुनकी भाजन, कूटि कूटि करि भरी बुराई॥ [1]
हाहा कृपाकरौं स्वामिनि अब, तुव पदपंकज में शिर नाई।
ललितकिशोरी ब्रज दरसावो, देखो निजगुन मान वडाई॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (73)

हे श्रीराधा! मेरे बनाए तो कुछ भी सिद्ध नहीं होगा। मैं तो सदैव से अवगुणों से युक्त हूँ — मुझमें कूट-कूट कर बुराइयाँ भरी हुई हैं। [1]

हे स्वामिनी, अब आप ही कृपा कीजिये, मैंने अपना सिर आपके चरण कमलों में झुका दिया है। श्री ललितकिशोरी जी विनय करते हैं — “हे करुणामयी किशोरी जी! अपने असीम दयामय स्वभाव की ओर दृष्टि डालिए और मुझ अकिंचन पर कृपा कर, मुझे ब्रजधाम के दर्शन का सौभाग्य प्रदान कीजिए।” [2]