वृंदावन क्यों न भये हम मोर - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1375)

वृंदावन क्यों न भये हम मोर - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1375)

(राग मलार)
वृंदावन क्यों न भये हम मोर।
करत निवास गोवर्धन ऊपर, निरखत नंदकिशोर॥ [1]
क्यों न भये बंसी कुल सजनी, अधर पीबत घनघोर।
क्यों न भये गुंजा बनवेली, रहत स्याम जु की ओर॥ [2]
क्यों न भये मकराकृत कुंडल, स्याम श्रवन झकझोर।
परमानंद दास को ठाकुर, गोपिन के चित्तचोर॥ [3]

- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1375)

हे विधाता! मुझे वृंदावन का मोर क्यों नहीं बनाया? जहाँ मैं गोवर्धन पर्वत पर वास करता और नंदकिशोर श्रीकृष्ण को निहारा करता। [1]

हे सखि! मैं वंशी क्यों नहीं बना, जिससे श्रीकृष्ण के अधर-रसामृत का पान करने का सौभाग्य प्राप्त होता? मैं श्रीवृंदावन में गुंजा की बेल क्यों नहीं बना, जो सदा श्रीकृष्ण से सदा लिपटी रहती? [2]

मैं मकराकृति कुण्डल क्यों नहीं हुआ, जो श्री श्यामसुंदर के श्रवणों में सुशोभित होता? श्री परमानंददास जी कहते हैं — “मेरे ठाकुर श्रीकृष्ण, गोपियों के चित्त को चुरानेवाले हैं।” [3]