(सवैया)
जय गह्वर कुँज निकुँजन की, रस प्रेम प्रकाशिनी श्यामा की जय जय। [1]
जय गह्वर कुँज निकुँजन की, रस प्रेम प्रकाशिनी श्यामा की जय जय। [1]
जय दान और मान विलास गढ़ी, गहवर वन रसिक समाज की जय जय॥ [2]
रसिकेश्वर जहाँ सखी भेष धरैं, उन मोर बिहारिनि श्यामा की जय जय। [3]
रस प्रेम की मूरति गोपी बसें, श्रीधाम सदाँ बरसाने की जय जय॥ [4]
- ब्रज के सवैया
बरसाने में स्थित गह्वर कुंज-निकुंजों की जय हो, रस एवं प्रेम की प्रकाशिनी श्री श्यामा जू की जय हो। [1]
दानगढ़, मानगढ़ अथवा विलासगढ़ की जय हो, गह्वर वन के रसिक समाज की जय हो। [2]
जहाँ रसिकेश्वर श्रीकृष्ण सखी-वेश धारण करते हैं, उस मोरकुटी की जय हो, एवं श्री मोर बिहारिणी श्यामा जू की जय हो। [3]
रस एवं प्रेम की मूर्ति गोपियाँ जहाँ निवास करती हैं, उस श्रीधाम बरसाना की सदा जय हो। [4]
दानगढ़, मानगढ़ अथवा विलासगढ़ की जय हो, गह्वर वन के रसिक समाज की जय हो। [2]
जहाँ रसिकेश्वर श्रीकृष्ण सखी-वेश धारण करते हैं, उस मोरकुटी की जय हो, एवं श्री मोर बिहारिणी श्यामा जू की जय हो। [3]
रस एवं प्रेम की मूर्ति गोपियाँ जहाँ निवास करती हैं, उस श्रीधाम बरसाना की सदा जय हो। [4]

