भूले तैं करतार के, रागु न आवै रास।
यही समुझकै राख तू, मन करतारैं पास॥
- श्री रसनिधि
यही समुझकै राख तू, मन करतारैं पास॥
- श्री रसनिधि
यदि मनुष्य भजन गाते हुए खड़ताल को भूल जाय तो राग की लय भंग हो जाती है। ठीक उसी प्रकार, यदि मन को उस करतार (भगवान) में न जोड़ा जाए और केवल इन्द्रियाँ ही संलग्न हों, तो वह वास्तविक भक्ति कहलाने योग्य नहीं रहती और न ही उसमें रस प्रकट होता है।

