(राग मलार)
जमुना तट स्याम घटनि की पाँति।
जमुना तट स्याम घटनि की पाँति।
हरित भूमि बन, हरित सिखंडी, बोलत अति रस माँति॥ [1]
सुरंग चूनरी की छवि दुलहिन, अभरन नाना भाँति।
श्रीबीठलविपुल बिनोद बिहारि सों, मिलि विलसति किलकाँति॥ [2]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (28)
पावस की छटा का वर्णन करती हुई श्रीविपुलबिहारिनदासीजी कह रही हैं कि श्रीयमुनाजी के तट पर स्याम रंग की घटाएँ सुशोभित हो रही हैं। चारों ओर श्री वृंदावन में हरियाली ही हरियाली छाई हुई है। रस-मत्त होकर मोर बोल रहे हैं। [1]
नित्य दुलहिनीजू के अंग पर सुरंग चूनरी है एवं उन्होंने नाना प्रकार के आभरण धारण कर रखे हैं। श्री विट्ठल विपुल देव कहते हैं कि पावस की रस-माधुरी से विपुल विनोद में उन्मत्त प्रियतम बाँके बिहारी के साथ क्रीड़ा-परायण होकर प्रियाजी भी हर्षातिरेक में मधुर शब्द कर रही हैं। [2]

