रे चित्त चिन्तय चिरं वृषभानुपुत्रिं नो विस्मर क्षणमपीति ममाभिलाष:।
राधेति नाम जप भो रसने ममाङ्ग राधावने वस तदङ्गघ्रिरजोऽभिलिप्तम्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.67)
अरे मेरे चित्त! तू सदा श्री वृषभानु नंदिनी श्रीराधा का ही चिन्तन किया कर — उन्हें एक क्षण के लिए भी कभी न भूलना, यही मेरी अभिलाषा है। हे रसने! तू ‘राधा’ — इस सरस, मधुर नाम का जप निरंतर करती रह तथा हे देह ! तू श्रीराधा की परम पावन चरण-रज से लिप्त होकर, इस रसरूपा श्री वृंदावन में सदाकाल प्रेमपूर्वक निवास कर।

