मन रति वृंदावन सौ कीजै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (24)

मन रति वृंदावन सौ कीजै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (24)

मन रति वृंदावन सौ कीजै।
खायौ पीयौ भर्यौ भूँज्यौ, अब जीवन कौ फल लीजै॥ [1]
काज अकाज जानि सब आपुनौ, दाउ सँवारौ दीजै।
देखि धेनु सुनि बैनु रैनु तजि, धृक-धृक जग जौ जीजै॥ [2]
जमुना तट वंसीवट निकट, रहत जु यह तन छीजै।
वरषत स्यामास्याम रास रस, व्यास नैंन भरि पीजै॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (24)

हे मन, श्री वृन्दावन से प्रेम कर — तू अब तक केवल इंद्रिय-सुखों में पशुवत जीवन जीता रहा है, अब जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त कर। [1]

सत्य और असत्य को भली प्रकार से निर्णय कर अपने जीवन को सफल बना ले। श्री वृन्दावन की गायों को निहार, वंशी ध्वनि का श्रवण कर, वृंदावन की रज में लोट लगा, और इस छलपूर्ण संसार से मोह त्याग दे। [2]

श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि "हे मन, श्री वृन्दावन में यमुना किनारे वंशीवट पर निवास कर, जहाँ नित्य श्री श्यामाश्याम के महारास रस की वर्षा होती रहती है, जिसे अपनी आँखों से भर-भर के पिया कर।" [3]