तिहारो मोहि बल वृषभानु दुलारी  - श्री सरस माधुरी जी

तिहारो मोहि बल वृषभानु दुलारी - श्री सरस माधुरी जी

(राग परज)
तिहारो मोहि बल वृषभानु दुलारी।
यद्यपि हूं गुणहीन दीन मैं, तद्यपि शरण तुम्हारी॥ [1]
अशरण शरण अधम उद्धारण, विरद रावरो भारी।
याही के विश्वास भरोसे, जीवत जक्त मँझारी॥ [2]
निस्साधन शरणागत पालक, हो स्वामिनी हमारी।
‘सरसमाधुरी’ सी बहु सहचरि, भवसागर सों तारी॥ [3]

- श्री सरस माधुरी

हे वृषभानु-दुलारी श्रीराधा! मुझे तो एकमात्र आपका ही बल है। यद्यपि मैं गुणहीन और पतित हूँ, फिर भी मैं आपकी ही शरण में हूँ। [1]

आप अशरण की शरण हैं, अधमों का उद्धार करने वाली हैं। आपकी कृपा अतुलनीय है। इसी विश्वास के बल पर ही मैं इस जगत की मझधार में जीवन-यापन कर रहा हूँ। [2]

हे स्वामिनी! जिसका कोई साधन नहीं, जो पूर्ण रूप से आपकी शरण में है, उसकी एकमात्र पालक आप ही हैं।
श्री सरसमाधुरी जी कहते हैं, “हे श्रीराधा! मेरी जैसी अनेक सहचरियों को आपने इस भवसागर से पार कराया है।कृपा करके मुझ पर भी अपनी करुणा-दृष्टि कीजिए।” [3]